आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दश्त-ए-तन्हाई को...

                
                                                         
                            दश्त-ए-तन्हाई को गुलज़ार बना लेते हैं।
                                                                 
                            
ख़ार से जो भी मिले, हार बना लेते हैं।

लोग देते हैं हमें दर्द के तोहफ़े अक्सर,
हम उन्हीं दर्द को अशआर बना लेते हैं।

काँच के जितने भी टुकड़े हैं हमारी ज़द में,
उनको पलकों का ही शृंगार बना लेते हैं।

सामने आए कोई लाख समंदर बन कर,
हम तो तिनके को ही पतवार बना लेते हैं।

रात जितनी भी सियह हो, हमें डर क्या उसका,
हम चराग़ों को भी हथियार बना लेते हैं।

ज़िंदगी राह बदल ले तो बदलते हैं हम,
अपने हर मोड़ को किरदार बना लेते हैं।

सामने आए अगर कोई मुसीबत का पहाड़,
हम उसी ख़ाक से मिनार बना लेते हैं।

जितने शिकवे हैं ज़माने से भुला कर 'अज़हर',
हम तो हर लम्हे को त्यौहार बना लेते हैं।

- अज़हर साबरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर