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हिंदी ग़ज़ल

                
                                                         
                            कैसी है कानून व्यवस्था।
                                                                 
                            
लगती अफलातून व्यवस्था।।

यदि गर्मी की ऋतु है आई-
लगती मुझको जून व्यवस्था।

गल्ला मंडी में जब पहुंँचे-
हो जाती परचून व्यवस्था।

अब पतंग का मौसम आया-
उड़ते हैं बैलून व्यवस्था।

इंसान अगर है क्रूर हुआ-
क्यों बढ़ते नाखून व्यवस्था।

बंद लिफाफे में है रख्खा-
है कोई मजबून व्यवस्था।
-अविनाश ब्यौहार
 
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2 महीने पहले

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