कैसी है कानून व्यवस्था।
लगती अफलातून व्यवस्था।।
यदि गर्मी की ऋतु है आई-
लगती मुझको जून व्यवस्था।
गल्ला मंडी में जब पहुंँचे-
हो जाती परचून व्यवस्था।
अब पतंग का मौसम आया-
उड़ते हैं बैलून व्यवस्था।
इंसान अगर है क्रूर हुआ-
क्यों बढ़ते नाखून व्यवस्था।
बंद लिफाफे में है रख्खा-
है कोई मजबून व्यवस्था।
-अविनाश ब्यौहार
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