मुझे पता नहीं कि क्या मैं समझ चुका हूँ
या अभी और समझना बाकी है
इच्छाओं को, आशाओं को, प्यास को
और इनसे जुड़े मानसिक आभास को।
मुझे किसी के लौट आने की आशा नहीं है
बीते हुए समय को पाने की इच्छा नहीं है
नया कुछ पीने की प्यास नहीं है, और ये है
कि मेरे पास जो कुछ है, वो बहुत कुछ है।
मैं मान चुका हूँ कि मेरे टूट चुके हैं सम्बन्ध
संसार से, समाज से, आलाप-प्रलाप से
और जुड़ चुके हैं सरोकार मुझ स्वयं से
और उन चंद लोगों से जो मुझे मानते हैं
जिन पर मुझे विश्वास है कि मेरे अपने हैं।
अब सुख की तलाश का अंत लगता है
संतोष पा लेने की सुध प्रतीत होती है
संसार में कुछ नहीं है और मेरे भीतर
सारी आशाएँ.. इच्छाएँ.. दुख छुप चुके हैं।
.-अवतार सिंह अक्षरजीवी
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