आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेवफ़ा है तो रह

                
                                                         
                            बेवफ़ा है तो रह,
                                                                 
                            
वफ़ा का ढोंग तो मत कर,
जब छोड़ दिया बीच सफ़र में,
फिर मंज़िलों की बात मत कर।
रहगुज़र और भी मिल जाएँगी,
राह चाहे तन्हा हो बेशक,
कीमत गिरा ली नज़रों में अपनी,
खुद को बेशकीमती कहकर।
हुनर मिला तो सिला देंगे,
तेरी बेवफ़ाई का हम भी,
बस महफ़ूज़ रख ख़ुद को,
महफ़िलों की शम्मा बनकर।

भरी महफ़िल में जब वो सामने आई,
हमने भी अपने दर्द को लहजे में ढाल दिया।
जो छोड़ गई थी बीच सफ़र में कभी,
उसी के सामने ग़ज़ल कह उसे बेचैन किया।

न शिकवा किया, न कोई सवाल किया,
बस अल्फ़ाज़ से अपना मलाल बयां किया।
वो सुनती रही ख़ामोश होकर,
और हमने "बेसुध" उसे आइने के हवाले किया।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर