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मासूमियत की मौत

                
                                                         
                            हिम्मत बटोर, आईने से आँख लड़ाई,
                                                                 
                            
कौन अजनबी यह मुझे घूर रहा?
कितनी कठोर है आभा इसकी,
और कितनी क्रूर ये आँखें हैं,
चढ़वाया था सूली पे बचपन,
पर किसने किया मानवता का पतन?

बेबाक होकर भरता था मैं उड़ान,
छोटा पड़ता था बचपन का आसमान,
क्या समाज, क्या लोग और क्या उनकी बातें?
पर रुख मुड़ा और हुआ परों का बलिदान।
आज़ादी का आसमाँ भी लगता है अब अरमान,
मैं सभ्यता का कैदी हूँ, लड़कपन से ही अनजान।

वयस्कता के इस शहर में सारे कलाकार,
मुस्कान का मुखौटा पहनते यह लाचार।
मासूमियत की मौत का कौन है ज़िम्मेदार?
गंभीरता की महामारी ने किया है बीमार।
घुटन की हवा बहती इस शिष्ट-संसार में,
है समाज इस विषाणु का प्रिय खरीददार।

भीतर कहीं सुनता हूँ बचपन की सिसकी,
सहायता की पुकार लगती यह आवाज़।
आईना बना है कटघरा अब कचहरी का,
हत्या के जुर्म में, सज़ा मिली मुझे आज।
नाशुुक्री में नादानी की नौका को डुबाकर,
तहज़ीब के टापू पर पहना है टूटा ताज।
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2 महीने पहले

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