स्वघोषित वकील बैठा, मंदिर का महा पुजारी,
ईश्वर के अनुमोदन बिना, करता वकालत अहंकारी,
अज्ञानी आत्मविश्वास के बूते बना अधिकारी,
असहाय मुवक्किल समझ कर ली यह ज़िम्मेदारी,
है अनावश्यक कार्रवाई, वह है बस एक व्यापारी।
वकीलों के धार्मिक दफ्तरों में भीड़ बड़ी,
सबकी इच्छाओं के बनते महंगे हलफ़नामे,
सच्चे श्रद्धालुओं के पहुँचाते फ़र्ज़ी पैग़ामे,
दानपात्रों का धन जैसे इनके जाती इनामे,
अपने नाम कराई, भगवान की वसीयतनामे।
भक्तों के भाव पर लगाते यह पाबंदी,
भक्ति की करते यह चालाक चकबंदी,
कुछ धर्मों के डर से, करते ईश्वर की नज़रबंदी,
धर्म को बनाया धंधा, और मंदिर को मंडी,
लोगों को बनाया ग्राहक, और भगवान को बंदी।
कुछ रीतियों से करते ग़ायब सारी यातनाएं,
दावा धर्मगुरुओं का, दांव पर लोगों की भावनाएं,
उनकी आस्था जलाते हवन में, जैसे ज़िंदा चिताएं,
तोड़ा हर सात्विक नियम धार्मिक संविधान में,
ईश्वर का अस्तित्व, कोई इन वकीलों से बचाए!
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