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गुमशुदा रंग

                
                                                         
                            रोशन रंगों के गुज़रे मेले में,
                                                                 
                            
छोड़ आए हम कुछ प्रिय रंगीन,
शालीनता के शौक़ में करे शहीद,
कई हमने रंग-बिरंगी रूहें,
सरलता के सहारे मारी सतरंगी उम्मीद।

पहले पीली आशा को किया था परित्यक्त,
सूरज और सरसों से छीना उनका सार,
खेतों और नीले अम्बर का जो था श्रृंगार,
स्वै सोने की सुन्दरता का था यह प्यार,
यह रूहानी रंग ज़र्द था प्रकृति का उपहार।

दूसरा रंग जो छूटा, था सिन्दूरी सांझ,
साहस और जुनून का था रंगीला गुमान,
तिरंगों और मांगों में था जिसका स्थान,
कलाकारों के रंग-चित्रों से भी अब अनजान,
बदले भी संतरे-हरे, भूलकर अपनी पहचान।

फिर भूरे रंग की भूले हम भावना,
माटी और पेड़ों की हस्ती में हिस्सेदार,
कत्थई चूमता जिसके हाथ, था वो कोमल कुम्हार,
मेहंदी में बसके था रूमानी गहराई का किरदार,
करोड़ों किताबों में था इसका बहुमूल्य अधिकार।

खोकर पूरा इंद्रधनुष, किया आकाश को विधुर,
इमारतों और कपड़ों में ढूंढा हमने अंतिम संस्कार,
अब काले, सफेद और धूसर को करते दुलार,
रंगीन कब्र पर बैठी मानवता, एक-रंगी छांव में,
बस इंसानी चेहरों में है अब रंगों का संसार।
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2 महीने पहले

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