नासमझ और नादानी के जादुई कालीन पे सवार,
सपनों के आसमान को चूमता था बहुत बार,
हुनर के नर्म बादलों पर खेला करता था,
जिज्ञासा के झूले से, कभी इस पार, कभी उस पार,
हक़ीक़त में था आसमान में उड़ने को तैयार।
खयाली बादलों से फिसला ज़मीनी सत्य पर,
व्यावहारिकता के छोटे पेड़ों पर आ अटका,
डॉक्टर और इंजीनियर के ही लगे थे कड़वे फल,
सपनों का अम्बर अब था ऊँचा और दूर,
जब डाल टूटी, था मैं समझदारी में चूर।
पटक उठा और था बेहोश पथरीली भूमि पर,
उठा तब देखा, रोज़गार का भीड़ भरा बाज़ार,
कॉरपोरेट के कीचड़ में सब नंगे लगाते दौड़,
मैला बदन लेकर सब साफ़ सूट का करते विचार,
जीवन की कठोर यात्रा से बदला सपनों का आकार।
भागा भीड़ के हल्ले से शांत समंदर की ओर,
कविता की कला-रूपी काया पर मैं हुआ सवार,
कागज़ की लहरों से आते लफ़्ज़ों के सुकूनी छिट्टे,
बिना साँस बाँधे मारी स्याही में मैंने डुबकी,
ऊँचाइयों में उड़ता था, आज गहराइयों में तैर रहा,
उफ़ुक पे आसमान और समंदर का होता व्यवहार,
कला के सागर से है सपनों के आकाश का द्वार।
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