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अहंकार का महल

                
                                                         
                            मज़दूरों के हाथों एक महल बनवाया,
                                                                 
                            
अहंकार के संगमरमर से सजवाया,
मज़बूत दीवारें खड़ी कर उसने,
कमज़ोर नींव पर ध्यान ना फ़रमाया।

एक तरफ खड़ी ऊँची राजसिक मीनार,
दिखा काम वासना से बना छोटा द्वार,
गर्दन झुक्लाके गया जब अन्दर,
फिर चढ़ी उसने लालच की सीढ़ी,
उचाई पर सांस भरी गुरूर की,
दृश्य दिखा बस चमकता अहंकार।

उधर खड़ा तामसिक चबुतरा,
अविद्या के अंधेरे में घिरा,
और आलसी खंबो पर शान से खड़ा,
भटकता रहा मसहूर माया के मोह में,
दिखा अंधेरे में बस गुमराही अहंकार।

बीचो-बीच है मुख्य आलीशान दरबार,
सुंदर बनावट मगर घृणा का भरमार,
क्योंकि बैठे वहाँ सब सारे अहंकारी,
नीचा दिखाने को आपस में आतुर व्यापारी,
सजा वहीं बीच में अहंकार का सर्वोच्च सिंहासन,
बैठ उसपे महल-मालिक का मदहोश मन,
तभी गूंजी सन्नाटे की एक चीख गहरी,
यह महल नहीं, है अहंकार की कब्र सुनहरी।
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3 महीने पहले

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