ना रास रचाने से,
ना चक्र चलाने से।
यह धरा तो बच पायेगी,
एक तेरे आने से।
वृंदावन बस रह गया,
वेद पुराणों में।
आडम्बर बस रह गया,
हमारे जमाने में।
कूड़ा कचरा खातीं गैया,
तेरे जाने से।
यह धरा तो बच पायेगी,
एक तेरे आने से।
घर में गैया कोई न पालें,
कर दें क़साई के हवाले।
फिर कहते हैं, गाय बचाओ,
घर घर में हैं दो मूंह वाले।
खुद की खूब शान समझते,
श्वान घूमाने से।
यह धरा तो बच पायेगी,
एक तेरे आने से।
-आशु सिंह अमिट
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