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तेरे बिना ऐ फुर्सत

                
                                                         
                            खोजने निकला हूँ तुझे ऐ फुर्सत
                                                                 
                            
फुर्र हो गई है न जाने किस गली में
तू ही लौटा सकती है सुकून के पल
जैसे तितलियों को मिलते हैं कली में

न पैसा न शोहरत न कोई शौक है
हम मारे गए हैं तुझसे दिल्लगी में
पाकर भी सब कुछ बेचैनी जमा है
एक तू ही नहीं तो फिर क्या जिंदगी में

रातें बनीं थीं तुझे पाने की खातिर
तू गायब है परछाई सी आवारगी में
ख़्वाहिशों पर पर्दा डाला है ऐसे
चाँद छुपता है जैसे अक्सर बदली में

बसा ले आशियाना जहाँ भी मन हो
अलाप ले कोई राग सूनी डफली में
पर याद रखना, तुझे लौटना ही पड़ेगा
वरना तेरा आशीष अधूरा रहेगा असली में

लोग देते हैं ताना कि सब पास है तेरे
झाँकते नहीं हैं दिल की उदास गली में
ले देख सब सूना है तेरे बिना ऐ फुर्सत
उलझा पड़ा हूँ रोजमर्रा की जिंदगी में

बचपन की सारी कहानी में थी तू
कभी मिलती थी दोस्तों की मंडली में
होली के सारे रंग जवाँ थे तुझ से
मिलती थी रंगोली बनाते दीपावली में

गूँथा था कभी फूलों के संग मैंने
उकेरा था तुझको कभी चित्रावली में
पर मिलती थी हमें हर हाल में फुर्सत
उलझे थे चाहे कितना भी प्रश्नावली में

जब लौटेगी तू तो सजाऊँगा महफिल
सितारों की जगह बिठाऊँगा कुंडली में
कान्हा की पुकार सुनती थी राधा जैसे
तू ढूँढा करेगी मुझको वैसे ही मुरली में

- आशीष कुमार
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3 महीने पहले

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