आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये ज़िंदगी की कसमकश

                
                                                         
                            ये ज़िंदगी की कसमकस
                                                                 
                            
जीने हमें देती नहीं,
हंसने हमें देती नहीं
रोने हमें देती नहीं।
कब तक मनाए ग़म कोई
कब तक सहे दिल की चुभन,
बदल चुकें जज़्बात पर
कहीं यादों में ख़लिश सी है।
मेरी ख़्वाहिशे पूरी हो अब
दिल ज़िद भी अब करता नहीं,
तुफ़ानों ने समझा दिया
जीवन पे बस चलता नहीं।
तन्हाईयां रूसवाईयां है
खुशियों के है डेरे यहां,
इंसान है मज़बूर सा
है वक्त के फेरे यहां।
किसी ओर से भी गुज़रूं मैं
उलझें से है सब रास्ते
भला ज़िंदगी के काफ़िले
थमी है किसी के वास्ते।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर