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किताब सी ये ज़िंदगी

                
                                                         
                            गुज़र चुके लम्हों से भरी
                                                                 
                            
किताब सी ये ज़िंदगी,
नफ़ा और नुक़सानों में ढली
हिसाब सी ये ज़िंदगी।
किस पल में ख़ुशी झलकी
कब छलक गये नैन,
अतीत में डूबी हुई इक शाम
सी ये ज़िंदगी।
ख़ताएं जो हर उम्र में कुछ
सीख दें कर गयीं,
ठोकरें खा कर राहों में बड़ी
बेहाल सी ये ज़िंदगी।
ख़्वाब सजाएं आंखों ने फिर
टुटे और बिख़रे,
चुभते हुए किरचों की एहसास
सी ये ज़िंदगी।
कुछ ग़लतियां अपनी रही कुछ
अपनों ने किये,
खोये हुए रिश्तों जैसी ख़ामोश
सी ये ज़िंदगी।।
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2 महीने पहले

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