किस बात का मैं ग़म करूं
किस बात पर खुल के हंसू,
हर बात अब मुझको ज़रा
जुड़ी जुड़ी सी लगती है।
किस रास्ते पर मैं चलूं
किस रास्ते को छोड़ दूं,
हर मंजिलों के रास्ते
मेरे दिल से हीं तो गुज़रतीं है।
कहीं फासले में आस है
कहीं है दिलों में फासले,
कोई कहता है तू ग़ैर है
कोई मेरे बिन कुछ भी नहीं।
कितने भी गुज़रे वक्त पर
दिल की फ़िजा बदली नहीं,
हर ज़ख़्म जो सिले से थे
खुले-खुले से लगती हैं।
जीवन अब हर एक रंग में
ढली-ढली सी लगती है,
लिखीं वक्त ने जो किताब थी
धुली-धुली सी लगती है।।
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