आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कई रातों को मिला कर

                
                                                         
                            कई रातों को मिला कर मेरी
                                                                 
                            
एक रात होती है।
यादों में गुज़रे लम्हों की जब
बरसात होती है।।

बरसों गुज़ारे है हमने तन्हाइयों
के संग।
जाने कहां दिल से दिल की
मुलाक़ात होती है।।

मेरे दिल में छुपी बैठी है ख़ामोश
सी कसक।
गाहे-बगाहे उससे मेरी मुलाक़ात
होती है।।

एक रोज़ मिल जाएंगे मेरी वफ़ा
का सिला।
इसी इंतजार में ज़िंदगी अवसान
होती है।।

परछाइयों के पीछे पीछे
भागते हुए।
एक रोज़ अपने आप से
मुलाक़ात होती है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर