ज़बाँ पर बर्फ़ रक्खी है, दरून-ए-जाँ शरारा है
अगर हम मुस्कुरा बैठें, तो दुनिया का ख़सारा है
हमारे बाद काग़ज़ पर कोई मौसम नहीं उगता
हमीं ने धूप ओढ़ी है, हमीं ने शब उतारा है
ये सच के तेज़ रस्ते पर ज़रा सी चाशनी पी लो
बड़ी संजीदा ख़िल्क़त को तबस्सुम ने सँवारा है
वो कहते हैं कि रक़्स-ए-मौज में तदबीर शामिल हो
हमीं को डूब जाने के तरीक़े ने उबारा है
क़ज़ा जब सामने आए, तो कहना बैठ कर पी ले
फ़क़त दो घूँट क़हवे का ये सारा इस्तिआरा है
हम अहल-ए-अक़्ल की बस्ती में रह कर भी सलामत हैं
कि अपने होश को खोना, हुनर अपना हमारा है
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