मोहब्बत को
जिस्म की सरहदों में क़ैद करने वालो,
कभी रूह की ज़ुबाँ भी पढ़ी है तुमने?
लम्हों की भूख को
सदियों की वफ़ा का नाम देना,
कुछ यूँ है...
जैसे धुएँ को आफ़्ताब कहना।
लबों की प्यास बुझ जाने से
दिल आबाद नहीं होते,
बिस्तर बदल लेने से
मुक़द्दर हमबिस्तर नहीं होते।
इश्क़...
बदन की ख़ुशबू से नहीं,
किरदार की महक से पहचाना जाता है।
और हवस...
वह हर बार
मोहब्बत का लिबास ओढ़कर आती है,
ताकि
आईनों को भी
अपने चेहरे पर यक़ीन आ जाए।
मगर...
सुबह की पहली रौशनी
हर लिबास का सच लिख देती है।
तब मालूम होता है,
चादर पर पड़ी सिलवटें
सफ़र की गवाह हो सकती हैं...
मोहब्बत की नहीं।
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