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बड़ी विडंबना

                
                                                         
                            है यह कैसी विडंबना, सोचने को कर रही मजबूर
                                                                 
                            
दे रही है बहुत पीड़ा, दिमाग पर है बहुत जोर
जब माता-पिता होते जाते हैं असहाय , वृद्ध और कमजोर
तब हम बड़े होकर, हो जाते हैं जवान
जब तक हम इस बात की कर पाते हैं पहचान
या तो वो हो जाते हैं वृद्ध या चले जाते हैं बहुत दूर
है यह कैसी विडंबना, सोचने को कर रही मजबूर

एक चोट लगती थी तो माँ हो जाती थी परेशान
नहीं सो पाती थी सारी रात
हर समस्या या आवश्यकता के समय पापा रहते थे साथ
तब लगता था ये सदा रहेंगे तुम्हारे पास
लेकिन जीवन की यही है सच्चाई, वो धीरे-धीरे हो जाते हैं बहुत दूर
है यह कैसी विडंबना, सोचने को कर रही मजबूर

जिस पिता ने हाथ पकड़ कर चलना सिखाया, आज वही हैं लाचार
उन्हें तुम्हारीआवश्यकता है, चाहिए तुम्हारा स्नेह और प्यार
अपना दर्द छिपाकर जो देखते थे भविष्य के सपने
वही मां-बाप आज ढूंढ़ रहे हैं दुनिया में बच्चे अपने
जिस मां ने स्वयं भूखी रहकर तुम्हें खिलाया
वह परेशान है तुम्हारे पास बैठने को ,करने को कुछ बात
करते रहते हैं दूरभाष का और तुमसे बात करने का इंतजार
है यह कैसी विडंबना, सोचने को कर रही मजबूर

घर नहीं होता छोटा- बड़ा
पर होता है खुशनहाल,जहाँ मां-बाप रहते हैं साथ
ऐश्वर्य और सुख-सुविधा संग्रह करने में मत हो जाएं इतने मग्न
कि जिनके लिए काम कर रहे हो, वह भी उनके जाने पर हो जाए बेकार
दुनिया में सब मिल सकता है,पर नहीं मिलता फिर माता-पिता का दुलार
जब वो चले जाएंगे ,उस समय समझ आएगा अपना कसूर
है यह कैसी विडंबना, सोचने को कर रही मजबूर

अभी भी है समय और अवसर
मां-बाप का रखो ध्यान,करो उनका सम्मान
जिनके पास होते हैं मां-बाप,होते हैं बहुत भाग्यवान
हैं भू पर ईश्वर का रूप, ईश्वर के अवतार
मां बाप की सेवा ही है ईश्वर की आराधना के समान
मेरी इस शिक्षा पर सोच-विचार करो ज़रूर
है यह कैसी विडंबना, सोचने को कर रही मजबूर
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