सोचा न था कभी दिन , ये देखना पड़ेगा,
अपने ही क़ाफ़िले को , रहबर ही लूट लेगा।
हम तो समझ न पाए , इस ना - ख़ुदा के मन की,
मझधार में ये लाकर , कश्ती को छोड़ देगा।
हालात बद से बद्तर, होते ही जा रहे हैं,
माली चमन उजाड़े , कैसे चमन बचेगा।
बच्चों के साथ जब ये , अन्याय हो रहा है,
इस देश का मुक़द्दर , कैसे बता बनेगा।
इतनी ये ज़िद तुम्हारी , नुकसान ही करेगी,
जनता के आगे इक दिन , झुकना तुम्हें पड़ेगा।
था पासबाँ वतन का , जिसको चुना था हमने,
वो क्या बचाएगा गर , ख़ुद लूटने लगेगा।
- अरुण शर्मा
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