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किस्मत का मारा

                
                                                         
                            तुम्हें फुर्सत नहीं मिलती,
                                                                 
                            
बहुत हम याद करते हैं,
पुराने दिन जो बीते हैं,
यही फरियाद करते हैं,
कभी तो वक्त दो थोड़ा,
तेरी चाहत के आशिक हैं,
गुज़रता वक्त ऐ पल-पल,
मुझे अब दर्द देता हैं,
तेरी खातिर हूं मैं जिंदा,
तुझे नफरत नहीं मुझसे,
मगर फिर ऐ दूरी क्यूं,
हुई कैसी ख़ता मुझसे,
ख़फ़ा है क्यूं तूं यूं मुझसे,
बता तो दे जरा मुझसे,
मैं आशिक हूं दिवाना हूं,
मगर किस्मत का मारा हूं।।
-अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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