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धरती की पुकार

                
                                                         
                            कभी पेड़ों से पूछो,
                                                                 
                            
कितनी ख़ामोशी से
वो हमारी साँसें सँभालते हैं...
कभी नदियों से पूछो,
कितने ज़हर पीकर भी
वो हमारी प्यास बुझाती हैं।

हमने तरक़्क़ी के नाम पर
जंगलों को ख़ामोश किया,
और फिर शिकायत की
कि मौसम बेवफ़ा हो गए।

याद रखिए—
अगर हवा थक गई,
तो साँसें भी थक जाएँगी।
अगर धरती रो पड़ी,
तो आने वाली नस्लें भी रोएँगी।

एक पेड़ लगाइए,
एक नदी बचाइए,
एक इंसान बन जाइए...
क्योंकि सबसे ख़ूबसूरत विरासत
दौलत नहीं,
एक ज़िंदा धरती होती है।
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3 महीने पहले

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