एक रात ऐसी भी…
तुम क्या जानो उस रात की पीड़ा,
जिस रात माँ हमसे दूर हुई…
कहने को तो हैं मेरी माएँ बहुत,
पर अपनी वाली माँ की बात ही कुछ और थी।
तुम क्या जानो उस एहसास की बात,
जिसके सहारे गुज़ारी अपनी वो रात…
नहीं कट रही थी वो काली रात,
जिस दिन हमसे छूटा माँ का हाथ।
अब तो हर रात सवेरी लगती है,
फिर भी ये बात अधूरी लगती है…
जो मैंने खोया,
ना खोए कोई…
आज के बाद।
जिसे माँ का प्यार मिला है,
वो उसकी क़दर करे हर बार,
क्योंकि माँ के जाने के बाद
बस यादें रह जाती हैं,
और रह जाता है एक अधूरा-सा संसार।
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