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वो मेरा पक्का दोस्त था

                
                                                         
                            वो मेरा पक्का दोस्त था…
                                                                 
                            
वो मेरा पक्का दोस्त था,
दोस्त से भी बढ़कर था।
मेरे सुख-दुःख का साथी था,
मेरे हर पल का राज़दार था।
न जाने अचानक क्या हुआ,
वो इंसान ही बदल गया।
अपनी बातें छिपाने लगा,
नज़रें मुझसे चुराने लगा।
घर बुलाकर भी वो,
मेरा निरादर करने लगा।
कुछ समझ नहीं आया,
मन को बहुत समझाया।
कभी खुद से सवाल किए,
कभी बीते लम्हों को याद किया।
फिर एक दिन मैंने भी,
एक कठिन-सा निर्णय लिया।
शायद यही सही था,
शायद यही ज़रूरी था।
जो दूर जाना चाहे,
उसे रोकना भी क्या ज़रूरी था?
जो रिश्ता बोझ समझने लगे,
उसे ढोना भी क्या ज़रूरी था?
जो कद्र करना भूल जाए,
उसे याद दिलाना भी क्या ज़रूरी था?
बस, फिर मैंने ख़ामोशी से,
उससे दूरी बना ली।
न कोई शिकायत रखी,
न कोई सफ़ाई माँगी।
अब सब ठीक-ठाक लगता है,
न कोई उपेक्षा, न कोई अपेक्षा।
न किसी से कोई शिकायत है,
न किसी से कोई आशा।
मन अब शांत रहता है,
ज़िंदगी का सफ़र भी आसान लगता है।
दो परिवार, जो कभी एक थे,
एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ थे।
आज फिर से दो हो गए,
जाने कितने अपने पराए हो गए।
कभी इस बदलाव का दर्द था,
कभी दिल में कई सवाल थे।
अब वक़्त ने इतना सिखा दिया—
हर रिश्ता उम्रभर का नहीं होता,
और हर अपना हमेशा अपना नहीं होता।
अब न कोई शिकवा है,
न किसी से कोई गिला है।
जो साथ था, वो खूबसूरत याद है,
जो दूर है, उसे दूर ही रहने दिया है।
क्योंकि अब मैंने यह सीख लिया है—
रिश्ते बचाने की कोशिश में
अपना सुकून खोना ज़रूरी नहीं।
किसी के बदल जाने का ग़म सही,
पर खुद को खो देना ज़रूरी नहीं।
अब सब ठीक ही लगता है…
शायद ज़िंदगी का यही सबक़ है—
कुछ रिश्ते छूट जाते हैं,
मगर उनके छूट जाने से
ज़िंदगी रुक नहीं जाती।
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एक दिन पहले

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