हम सब हैं स्मार्टफोन की कैद में,
किताबों की महक और जीवंत संवादों को रौंदकर
करते रहते हैं स्क्रॉल, हुए कुछ यूँ मदहोश।
अब हमें भावनाओं को पढ़ने में होती है कठिनाई,
हम देखना ही नहीं चाहते दुनिया की सच्चाई,
क्योंकि स्मार्टफोन ने वर्चुअली एक-दूसरे से दुनिया मिलाई।
रिश्ते चलते हैं स्टेटस की ओर,
गुड मॉर्निंग-गुड नाइट की लगी है बस होड़।
और कुछ जानने-पूछने का हम नहीं लगाते जोर,
कुछ इस कदर आसक्त हैं हम स्मार्टफोन की ओर।
जीते नहीं हैं जिंदगी, बस खर्च करते हैं हर रोज,
आज साधन हैं, फिर भी काम किसी के न आते।
कल को साधन नहीं थे, तब खुद चल के हाल-चाल पूछ आते,
कितना अपनापन और स्नेह था,
स्मार्टफोन ने यह अनुभव भी छीन लिया है।
हुए हैं हम इसमें कुछ ऐसे गुम,
स्टेटस देख के अंदाजा लगाने की लग गई है धुन।
ऐसे तो हम पूरी दुनिया से जुड़े हैं,
पर बहुत अकेला महसूस होता है।
लगता है दोस्त हैं सिर्फ नाम के,
पर अपना कोई नहीं होता है।
अब दादी माँ कहानियाँ नहीं सुनातीं,
क्योंकि मम्मी यूट्यूब हैं चलातीं।
सुनते हैं लोरी, देखते हैं कार्टून,
पर दादी माँ सा स्नेह नहीं पाते।
आज गिल्ली-डंडा नहीं खेलते,
ना लुका-छिपी का वक्त मिलता है,
ना प्रेमपत्र लिखते,
क्योंकि हमें एक मैसेज का जवाब देने में भी
कई दिनों का वक्त है लगता।
यही वजह है अब रिश्ते नहीं चलते,
भीड़ बहुत है फिर भी अकेले रहते।
क्योंकि हम सब हैं स्मार्टफोन की कैद में,
किताबों की महक और जीवंत संवादों को रौंदकर
करते रहते हैं स्क्रॉल, हुए कुछ यूँ मदहोश।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
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