अंधेरा जो मेरे डर का हिस्सा था,
पता नहीं ऐसा क्या था
जो उधर बसता था।
जैसे अंधेरे कमरे में
कोई परछाई
चुपचाप मेरी ओर बढ़ रही हो।
मुझे हमेशा सोने के लिए
कमरे में किसी की आवाज़
चाहिए होती थी।
अंधेरे में
बाहर लैम्पपोस्ट से आती हुई रोशनी भी
मुझे डरा देती थी।
सोते ही
मैं किसी अनजान शहर में पहुँच जाती थी।
चारों तरफ़ भीड़ का शोर होता था,
और मैं...
बिल्कुल अकेली।
मैं अपने ही घर में खोई रहती थी,
अंधेरे में
अपने ही घर को ढूँढ़ रही होती थी।
एक मोमबत्ती जलाने भर का साहस भी
मुझमें नहीं होता था।
डर लगता था,
तो सबसे पहले
हनुमान चालीसा याद आती थी।
मुझे हमेशा दिन का समय भाता था,
तारों की रोशनी में भी
एक बेचैनी रहती थी।
ऐसा नहीं है
कि सारे डर खत्म हो गए हैं,
बस अब उन्होंने
मुझे रोकना छोड़ दिया है।
अब अंधेरा मुझे डराता नहीं,
मैं ही उसके बीच
अपनी रोशनी लेकर चलती हूँ।
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