तालीम अब व्यापार है,
हर ओर बस बाज़ार है।
कॉलेजों में भीड़ है,
छत्ता-सा हर द्वार है।
डिग्री लेकर क्या करें,
रोज़गार लाचार है।
फीसों का ही खेल है,
ज्ञान क्यों बीमार है?
भाषणों में तालीम है,
जेबों में व्यापार है।
ऊँची-ऊँची इमारतें,
खाली हर किरदार है।
'समर' सच बोलिए,
इल्म क्यों शर्मसार है?
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