मुकद्दर पर अगर, किसी का जोर होता
तो हर आदमी , कुछ और होता II
कोई जमीं ना तड़पती, आसमां से मिलन को
अगर आसमां का , कोई छोर होता II
प्यास दिल की किसी के , बदलती ना अपना इलाका
बादल वफाओं का दूर तक भी, गर घनघोर होता II
ना होता कोई गम, ना होता कोई गम का मारा
दुनिया- ऐ- महफ़िल में, गर खुशियों का शोर होता II
दिल और ये आईने हैं एक जैसे, टूट जाए तो जुड़ते नहीं
ना तोड़े कोई दिल किसी का, टूटे दिल में नहीं कोई दौर होता II
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