शुरुआती कवियों की रचनाओं में
श्रृंगार रस ही समाया रहता है,
किसी कवयित्री की कल्पनाओं में
ये मन अब बावरा रहता है।
चाँद को उसका चेहरा पढ़ना,
नदी की चंचलता से तुलना करना,
हर पल प्रकृति को निहारकर
रचना करना--
मन में हर पल उसकी यादों का
तूफ़ान-सा छाया रहता है।
शुरुआती कवियों की रचनाओं में
श्रृंगार रस ही समाया रहता है...।।1।।
मैंने तुमको देखा तो जाना,
अनुभूति क्या होती है...
दूसरों के साथ मुस्काते देखा,
तो जाना ईर्ष्या क्या होती है।
जो शब्द निकल न पाया मुख से,
उसे मैंने किताबों में स्थान दिया।
तुमको दोस्त बनाने की चाह में
तुम्हें निहारता रहता हूँ,
तुम संग समय बिताने की ख़ातिर
मेरा ये मन मचलता रहता है।
शुरुआती कवियों की रचनाओं में
श्रृंगार रस ही समाया रहता है...।।2।।
तुमसे मिला तो जाना,
श्रृंगार रस से अनुपम कुछ भी नहीं।
सारे जग को बाँध पाना
किसी और के बस में नहीं।
करुण, वीर, भयानक, अद्भुत और शांत रस--
श्रृंगार रस में ही समाए रहते हैं।
कभी संयोग में, कभी वियोग में,
कवियों का मन मचला करता है।
शुरुआती कवियों की रचनाओं में
श्रृंगार रस ही समाया रहता है...।।3।।
-रविकुमार खोब्रागड़े
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