जंतर-मंतर की माटी भी,
हो रही होगी द्रवित।
देखकर अपनों के आघतो को,
हो रही होगी ग़मगीन।
अनगिनत हड़तालों का,
साक्ष्य बन खड़ा है कब से !
संसद भवन के सन्मुख होने का,
शायद मिला है इसको ये परिणाम!
भारत का मान बढ़ाने को,
खगोलिय विज्ञान बताने को,
राजा सवाई जय सिंह ने,
जो जंतर-मंतर बनवाया था ।
उसने कब सोचा था ये-
उसकी जंतर-मंतर की माटी भी,
कुरुक्षेत्र सा होगा इक दिन।
अपनों के खातिर,अपनों को ही,
लड़ना होगा अपनों से ही !
क्या ये सम्भव हो पायेगा!
अपनी भारत की माटी में,
सच के खातिर ना करना हो,
अब हड़ताल किसी जंतर-मंतर पर।
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