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तुझसे उल्फ़त जो थी अब वो नहीं है

                
                                                         
                            तुझसे उल्फ़त जो थी अब वो नहीं है
                                                                 
                            
वो एक आफ़त जो थी अब वो नहीं है

वो अपना कोई छूटा तो हुआ क्या?
वो एक ताक़त जो थी अब वो नहीं है

तू अब आए मिलने या फिर कि नहीं
वो एक हसरत जो थी अब वो नहीं है

कुछ भी था जो तेरा दीदार यहां
वो एक राहत जो थी अब वो नहीं है

हम रोज़ाना अब मिल लेते हैं भले
वो एक क़ुर्बत जो थी अब वो नहीं है

कह दो क्यों अब हम फिर ये इश्क़ करें
वो एक लज़्ज़त जो थी अब वो नहीं है

देखो उल्फ़त के अब मौसम हैं नये
वो एक उस्रत जो थी अब वो नहीं है ।
(उस्रत: तंगी/कठिनता)
-अनमोल
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एक महीने पहले

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