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स्वाभिमान

                
                                                         
                            एक बुढ़ा झुक चल रहा था
                                                                 
                            
मंथर मंथर आगे बढ़ रहा था
लेकर दो छोटी छोटी बकरी
राह पकड़ी थी उसने संकरी
दुबला पतला तन था
झुका झुका तन था
वह चल रहा बेमन था
बुढ़ापे में भी काम करना थी उसकी मजबूरी
रोटी से थी उसकी इतनी दूरी
जितनी चांद से धरती की दूरी
उसका स्वाभिमान बड़ा था
उसका श्रम बहुत बड़ा था
कम से कम भीख तो नहीं मांग रहा था
भले रोटी के लिए वह दे जी जान रहा था।
अपने स्वाभिमान पर वह कस कमान रहा था।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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3 सप्ताह पहले

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