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मन मेरा गऊंवे में अटके

                
                                                         
                            सुबह सुबह चिड़िया चहके
                                                                 
                            
मन मेरा गऊंवा में भटके
मन मेरा गऊंवे में अटके
शहर में खाया मैंने झटके
गऊंवा में दूध मिले टटके
मोटी छाली वाली दही
भोरे भोरे मिले सरगही
उसी दही के लिए मन भटके
शहर में चोरी से मन उलझे
हमर गऊंवा में मन सुलझे
रात भर दरवाजे खुले हैं
पर लोग प्यारे मिले-जुले हैं
न चोरी का डर है
न कोई फिकर है
यहां सब अपने हैं
शहर में सपने हैं
तो भी मेरा भाई
बन कर कसाई
चोरी चोरी चुपके चुपके
आकर चोर सा दुबके दुबके
बेच कर पुश्तैनी जमीं दिल्ली में भटके
पर मन मेरा गऊंवे में अटके।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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2 सप्ताह पहले

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