कागज के टुकड़ों के पीछे
सुंदर सुंदर मुखड़ों के पीछे
इंसान भाग रहा है
रात रात भर जाग रहा है
जीने के लिए मर रहा है
इंसान क्या क्या कर रहा है
कागज के टुकड़ों के पीछे
आत्मा से रीते रीते।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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