आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आईए ना हमरा बिहार में

                
                                                         
                            बुद्ध की धरती
                                                                 
                            
है नहीं परती
ज्ञान के पेड़ उगा जहां
सारा जहां
उतरा जहां
पावन ज्ञान बांटने वाले हम हैं
पर जरा सा भी नहीं अहं है
उस गया की धरती
जो नहीं है परती
मेरी कर्म स्थली यही है
जानता जिसे मही है
आईए ना हमरा बिहार में
जहां जहाज जईसन उड़े मनवा टूटही कार में।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर