दो दिन से हो रही है बरसात
सांझ से चूने लगी है खपरैल।
मध्य रात का पहर
हर चमक के साथ।
उसकी पत्नी उठती है सिहर।
और उसकी गोद में सोई मुन्नी
हर गरज के साथ जाती है चौक।
हर टपक के साथ होती है कसक
और चुभने लगता है आंखो में
एक पक्के मकान का स्वप्न।
दूर कहीं उठ रहा है शोर
शायद नदी बहा चली है बांध तोड़।
उसकी पत्नी बोली
कब सूरज निकलेगा
कब होगी भोर।
वो सोचने लगा
क्या सचमुच
सूरज निकलने से उसकी
भी होगी भोर।
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