न कोई महफ़िल, न कोई शोर था,बस सड़क किनारे चाय का एक छोटा-सा ठौर था।
भाप उड़ाती चाय में घुली थी शाम की नरमी,और तेरी मुस्कान में छिपी थी मेरी हर खुशी
कुल्हड़ से उठती खुशबू जब हवाओं में बिखर जाती,तेरी एक नज़र मेरे दिल में हलचल मचा जाती।
न महँगे कैफ़े की चाह, न रोशनी का जाल,तेरे साथ बिताया वो पल ही था मेरा कमाल।
दो घूँट चाय, कुछ अधूरी-सी बातें,और ख़ामोशी में लिखी जातीं दिल की सौगातें।
आज भी जब किसी मोड़ पर चाय की महक आती है,तेरी याद मेरे होंठों पर मुस्कान बनकर छा जाती है।
लोग कहते हैं इश्क़ बड़े शहरों में पलता है,मुझे तो सड़क किनारे की चाय में ही अपना ख़ुदा मिलता है।
-अनिता शर्मा बुंदेलखंडी
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