फ़ितरत में ही इंसाँ के दग़ा का साज़ होता है
घर में शहनाई बाहर राग-ए-मजाज़ होता है।
हक़ की बात को महफ़िल में भला कौन सुनेगा,
यहाँ पसंद हर इक को फ़रेबी अंदाज़ होता है।
आँखों में नमी रख कर हँसते हैं जो महफ़िल में
उन सादा-मिज़ाजों का अपना ही राज़ होता है।
बाहर के शोर-ओ-गुल में ढूँढते हैं सब जिन्हें
सच्चे ज़ज़्बातों का दिल में ही एज़ाज़ होता है।
ज़मीर इजाज़त दे जहाँ झुकता है सर वहीं 'अदा',
अदब वाले ज़हनों का रुतबा फ़राज़ होता है।
-अनिता दासानी 'अदा'
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