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विश्वास की बिंदी

                
                                                         
                            विश्वास की बिंदी
                                                                 
                            

उसने
जब तुम्हारे भाल पर
रक्खा वह नन्हा-सा रक्त-बिंदु,

लगा—
उषा ने
अपने प्रथम अरुणिम स्पर्श से
क्षितिज पर प्रभात बिखेर दिया हो।

तुमने कुछ कहा नहीं।

केवल
पलकों की झील में
विश्वास का एक कमल
धीरे-धीरे खिलता रहा।

वह स्पर्श
किसी अधिकार का उद्घोष नहीं था,

वह तो
जैसे वसंत की पहली हवा
किसी मौन वनलता से पूछे—

"क्या मैं तुम्हारे पास बैठ सकता हूँ?"

और वनलता
मुस्कान भर हिल जाए।

उस क्षण

न समय बोला,

न शब्द,

न कोई प्रतिज्ञा।

केवल
दो धड़कनों के बीच
एक अदृश्य सेतु बनता रहा।

तुम्हारे अधरों पर ठहरी
वह अलसाई मुस्कान,

मानो
शरद की चाँदनी ने
किसी शांत सरोवर में
अपना ही प्रतिबिंब देख लिया हो।

वह लाल बिंदु

सिंदूर नहीं,

एक सूर्य था—

जो किसी माँग में नहीं,

दो आत्माओं के
विश्वास-आकाश में उगा था।

प्रेम

शायद यही है—

जहाँ स्पर्श

देह से पहले

मन को छूता है,

और एक छोटी-सी बिंदी भी

समूचे जीवन का

सबसे उज्ज्वल

उदय बन जाती है।
-अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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