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रिश्तों की डोर

                
                                                         
                            रिश्तों की डोर
                                                                 
                            

थाली में सजे हैं
दीप, अक्षत और मिठास,
हथेली पर ठहरी है
रिश्तों की एक छोटी-सी आस।

कलाई पर बँधती है राखी,
धागा तो बस बहाना है,
इसमें बचपन की गलियाँ हैं,
और भाई-बहन का अफ़साना है।

वह बचपन,
जब छोटी-सी बात पर रूठना,
फिर चुपके से मुस्कुराना था,
एक-दूजे की शिकायत करना
और फिर साथ निभाना था।

आज समय ने
दोनों के रास्ते अलग कर दिए,
शहर बदल गए,
दूरियाँ बढ़ गईं,
पर यह धागा आज भी
दिलों को पास लाता है।

बहन की आँखों में
आज भी वही विश्वास है—
“तू है तो मुश्किलों से
लड़ने का साहस है।”

भाई की मुस्कान कहती है—
“तू जहाँ रहे, खुश रहे,
तेरी हर राह में
मेरी दुआ साथ चले।”

राखी केवल
कलाई पर बँधा धागा नहीं,
यह उन अनकहे वचनों का नाम है
जिन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं।

यह पर्व याद दिलाता है—
रिश्ते दूरी से नहीं टूटते,
वे टूटते हैं
जब हम उन्हें समय देना छोड़ देते हैं।

इसलिए आज
राखी के इस पावन अवसर पर
बस इतना-सा संकल्प हो—
समय चाहे जितना बदल जाए,
हमारे बीच का अपनापन
कभी कम न हो।

कलाई से उतर जाए राखी,
मगर दिल से न उतरे यह बंधन—
यही तो है
भाई-बहन के प्रेम की
सबसे सुंदर पहचान। 
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
54 मिनट पहले

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