मधुर मिलन की बेला~
नील गगन की छाँह तले,
जब संध्या उतर रही थी,
मंद पवन की उँगली जैसे
कुंतल-लतिका सँवर रही थी।
वन-वीणा के मृदु स्वरों में
किसका मधु-संदेश मिला,
अधरों पर अरुणिमा जागी,
मन में जैसे चांद खिला।
तुम समीप थे—
ज्यों शशि के सम्मुख
कुमुदिनी सकुचा जाती है,
अनजानी-सी पुलक हृदय में
धीरे-धीरे भर जाती है।
मधुकर बन तुम मंडराते,
मैं कलिका-सी खिलती थी,
एक अनाम अनुराग-सुधा से
अंतर-वीणा झिलमिलती थी।
निशि के आँचल में छिपकर
तारक-दल मुस्काए थे,
लगता था, नभ के आँगन में
हम ही गीत सुनाए थे।
वह क्षण आज भी साँसों में
मृदु सुवास बन रहता है,
जैसे सूने वन में कोई
मधुर वसंत ठहरता है।
तुम थे—मैं थी—और प्रकृति थी,
तीनों का वह एक विधान;
बिन कहे ही लिख गया जैसे
युग-युग का मधुमय अभिमान।
-अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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