किंशुक
किंशुक! तू किस हेतु धरा पर,
रक्तिम राग सजाता है?
किसके उर की अग्नि छिपाए,
वन-वन रंग लुटाता है?
दग्ध हृदय-सा लाल तेरा तन,
फिर भी मधुर मुसकाता है,
पतझर के सूने अंचल में,
नव-वसंत बन आता है।
तेरी अरुण पाँखुरी देखे,
मदन-मनोहर मन हारे,
मंद पवन जब तुझे झुलाए,
डोलें डाली-डाली सारे।
कोयल कूक उठे कुंजों में,
भ्रमर मधुप बन गाते हैं,
तेरे रक्तिम पुष्प देखकर,
वन के दिवस सुहाते हैं।
मानो उषा उतर आई हो,
धारण कर अरुणिम आभा,
मानो नव अनुराग हृदय में,
भरने आई हो मधु-रागा।
किंशुक! तेरी लाल छटा में,
जीवन का संदेश छिपा—
दुःख की धूल झटककर मन,
फिर से हँसना सीख रहा।
सूनेपन के बीच खिलाकर,
तूने यह उपदेश दिया—
ऋतु चाहे कितनी भी रूठे,
फिर आता मधुमास नया।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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