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ग़ज़ल — "ज़िक्र-ए-यार"

                
                                                         
                            ज़िक्र-ए-यार आया तो महक उठीं तन्हाइयाँ,
                                                                 
                            
दिल में फिर उतर आईं ख़ामोश-सी परछाइयाँ।

नाम उसका लब पे लाना भी इबादत-सा लगा,
रूह तक उतर गईं उसकी सभी गहराइयाँ।

वो न आया, फिर भी चौखट पर नज़र ठहरी रही,
इंतज़ारों ने लिखीं कितनी नई सच्चाइयाँ।

रात भर चाँद से करते रहे हम दिल की बात,
चाँद सुनता ही रहा मेरी सभी रुस्वाइयाँ।

उसकी यादों का धुआँ दिल से उठा इस तरह,
जैसे बरसों बाद जागीं हों दबी अंगड़ाइयाँ।

इश्क़ जब हद से गुज़रा, दर्द भी अपना लगा,
खिल उठीं दिल की बरसों की वीरानियाँ।

हमने चाहा भी तो उसको भुला पाए न कभी,
उसकी यादों ने ही बख़्शीं नई बेचैनियाँ।

'अनु' ज़िक्र-ए-यार रूह का सरमाया रहा,
उम्र भर साथ रहीं उसकी निशानियाँ।
-अनिता चतुर्वेदी
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2 महीने पहले

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