हम बहते चलते रहे, ज़िंदगी के हर मोड़ पर,
सुना था कि साहिल मिलेगा, जो पार करा देगा।
पर आशियाना ही मेरा इतना कमज़ोर निकला कि,
इल्ज़ाम से ही मुँह मोड़ उठा।
— अनिल शाह
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