दिल का जो मशवरा था मानना ही पड़ गया
अंजाम का हर खयाल टालना ही पड़ गया
नहीं था कोई किशन मुझ पर लड़ाई थोपी गई
मुकाबिल थे अपने हथियार डालना ही पड़ गया
किसको था सब्र राह पर तदबीर की चलता
तकदीर का सिक्का उछलना ही पड़ गया
सम्हाल लोगे तुम,यह सोचकर डगमगाया नहीं
गिरा मैं सच में खुद को संभालना ही पड़ गया
वो कौन थे शराफत से कर गए थे निबाह
अनाड़ी हम हुए आखिर तो हारना ही पड़ गया
मुखौटे लगाकर जीना कभी आसान नहीं था
सूरत को छुपाने को डालना ही पड़ गया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X