कैसे कह दूं कि बयां की है सच्चाई मैने
सिर्फ दिल में जो थी वो बात सुनाई मैंने
जाने कैसे ज़मीं से आसमां तक छाई है
एक वही बात जो खुद से भी छिपाई मैंने
कुछ तो दस्तूर निभाने का इरादा भी था
रुखसते वक्त असल बात बताई मैंने
चंद कतरे शोहरत के जिसे पीने को मिले
उसकी आंखों में भी देखी है खुदाई मैंने
हमें भी दुनिया की राहों पे चले जाना था
दूर मंजिल है जिसकी राह बनाई मैंने
कागजी आंखों से अश्क निकलते देखा
तेरी तस्वीर जब भी दूर हटाई मैंने
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X