कितने लम्हें कई सवाल लिये
गुजरे, बगैर मेरा हाल लिये
कुछ कुतूहल लिए जो आया था
चला जाता है कुछ मलाल लिये
क्या करूं कयास मेरी बातों पर
उसने चेहरे पे रख रूमाल लिये
सीखकर मुझसे सलीका चलने
हरदम मिला वो नई चाल लिये
वो पुकारेगा मुझको रोकेगा
हम चले आए ये खयाल लिये
उन्हीं हाथों को गन लिये देखा
देखते थे जिन्हें गुलाल लिये
हमें कोई हुनर आया भी नहीं
और सब थे बहुत कमाल लिये
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