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इश्क का क्या है कई बार हुआ करता है

                
                                                         
                            इश्क का क्या है कई बार हुआ करता है
                                                                 
                            
एक तूफान कई घर तबाह करता है
ये तो अक्सर हुआ कश्ती को छोड़ने वाला
डूबने लगता है दरिया में जब उतरता है
दिल बहल जाता है इन बेफिजूल बातों से
कहने वाला नहीं खुद इनपे यकीं करता है
जितनी रौनक है बागवान की बदौलत है
वरना सावन में भी चमन कोई उजड़ता है
पत्ता महफ़ूज़ है शजर की निगहबानी में
डाल से टूटकर तो दर बदर भटकता है
बिछा रखे सुनहले जाल,दाने चुगने को
परिंदा चुगने गया,आगे फिर क्या होता है
मोहब्बतों से ही मैं अपना दिल बहला लेता
ये आगे चलके मगर दिल उदास करता है
वो गाफिल भटकता रहा गुमनाम गलियों में
कोई घर पर मगर उसके लिए तरसता है
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4 घंटे पहले

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