जब्त जज्बातों पर रखना होगा
बहकते कदम परखना होगा
कोई नई कहानी न बन जाए
हर जलते लम्हे पर रुकना होगा
आपसे जहीन सोच बैठे हैं
हम न होंगे तो जहां का क्या होगा
वो है निहायत जरूरी मेरे लिए
शायद मेरे लिए रुका होगा
ये आग अगर बुझ भी जाए कहीं
देर तक समा धुआं धुआं होगा
बाद उनके वतन फरोशी का
खत्म शायद ये सिलसिला होगा
ये समा समाता ही नहीं आंखों में
कैसे कुदरत ने इसे बुना होगा
जो मिला हमें छूट जाएगा कभी
होगा हासिल वो तजुर्बा होगा
अब के जो हम गए इस शहर से
फिर न शायद कभी आना होगा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X