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हरी धरा को जहाँ हरि ने, अपना धाम बनाया है

                
                                                         
                            खेतों में लहराती सरसों, हरियाली की चादर है
                                                                 
                            
कहीं गेहूँ की बाल सुनहरी, कहीं गन्नों का सागर है
बड़ - पीपल की छाँव कहीं पर, कुईयों का मीठा पानी है
इस शीतलता के सम्मुख मैने अपना शीश नवाया है !

मिट्टी की सौंधी खुशबू में, जहां खिलता - पलता जीवन है
बोली में थोड़ा अक्खड़पन, स्वभाव में एक अपनापन है
दिल में प्यार समेटे है, ये हरियाणा का जीवन है
इस निश्चलता के आगे मैने अपना शीश नवाया है !

घी - रोटी, और लस्सी के संग, साग का स्वाद निराला है
खीर - चूरमा, कढ़ी - खिचड़ी, गुड़ की मीठी थाली है
सीधे-सादे देशी खाने में, खुशियों की हरियाली है
इस खाने के स्वाद के आगे कहां छप्पन भोग भी भाया है !

तीज और होली के मेले, मस्ती के अम्बार है,
प्रेम की मीठी बोली है, धर्म का पावन सार है
सादगी में जहां शान बसी है, संस्कारों का संसार है
मेहनत - मस्ती और प्रेम - धर्म, इसका सरल श्रृंगार है !

हरी धरा को जहाँ हरि ने, अपना धाम बनाया है
जिसकी पावन माटी ने, गीता का ज्ञान सुनाया है
कण-कण में जहां धर्म बसा है, गीत कर्म का गाया है
उस माटी की खुशबू आगे मैने शीश नवाया है !
– अनिल कुमार पुनिया
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3 घंटे पहले

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