जीवन है कुरुक्षेत्र, कठिनता आई गर पांडव-सी,
धैर्य-साधना साथ रहे, निष्ठा हो यदि आराधव-सी।
पथ में लाख विरोध उठें, विश्वास न डगमग होने दो,
मन में सत्य, हृदय में साहस, दृष्टि रहे शुभ माधव-सी।
साथ में होंगे कृष्ण, अगर श्रद्धा अडिग तुम्हारी है,
हर संघर्ष के पार विजय की एक नई तैयारी है।
जब-जब भाग्य चुनौती बनकर सम्मुख आकर ठहराएगा,
जब संशय का घना कुहासा राहों को धुँधलाएगा।
तब गीता का ज्ञान हृदय में दीपक बनकर जलने दो,
कर्म-पथिक के दृढ़ संकल्पों को मत कभी बिखरने दो।
साथ में होंगे कृष्ण, न मन में भय का वास रहे,
कर्म तुम्हारा धर्म बने, अधरों पर विश्वास रहे।
काँटों से संवाद करो, हर पीड़ा को गीत बनाओ,
गिरकर फिर उठने का साहस अपनी पहचान बनाओ।
विपदाएँ तो कालचक्र की केवल क्षणिक कहानी हैं,
जिनके मन में ज्योति जगे, राहें उनकी सुहानी हैं।
साथ में होंगे कृष्ण, यदि मन निष्कपट तुम्हारा है,
घोर निशा के बाद क्षितिज पर स्वर्णिम सुबह प्यारा है।
अन्यायों के सम्मुख झुकना जीवन का उद्देश्य नहीं,
सत्य-धर्म से विमुख हो जाना वीरों का आदर्श नहीं।
अर्जुन बनकर धनुष उठाओ, संशय का संहार करो,
अपने भीतर सोए साहस का फिर से तुम संचार करो।
साथ में होंगे कृष्ण, यही गीता का संदेश है,
धर्मयुक्त संकल्पों में ही जीवन का परिवेश है।
जीवन की रणभूमि में जब संकट घिरकर आएगा,
अपना ही विश्वास कभी जब डगमग-सा हो जाएगा।
याद करो उस सारथी को, जिसने गीता गाई थी,
मोहग्रस्त अर्जुन को जिसने कर्म-दीप दिखलाई थी।
साथ में होंगे कृष्ण, बस कर्मपथ पर बढ़ते जाना,
फल की चिंता छोड़ निरंतर कर्तव्य निभाते जाना।
-पंडित अनिल
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